प्रयागराज। Allahabad High Court ने बुलंदशहर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। कोर्ट ने कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ या शरीयत कानून देश के धर्मनिरपेक्ष कानूनों द्वारा लगाए गए बाल विवाह प्रतिबंध को खत्म नहीं कर सकता।हाईकोर्ट ने 19 आरोपियों की ओर से दाखिल FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए उन्हें कोई राहत देने से इनकार कर दिया।
नाबालिग लड़की की शादी रोकने पहुंची थी पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम
मामला बुलंदशहर के काकोर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम को सूचना मिली थी कि ग्राम सुनपेड़ा बक्सुवा में एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की का बाल विवाह कराया जा रहा है।सूचना मिलने के बाद टीम मौके पर पहुंची और विवाह रोकने के साथ लड़की को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की कार्रवाई शुरू की।आरोप है कि इस दौरान लड़की के परिजनों और 50 से अधिक लोगों की भीड़ ने टीम के साथ अभद्रता की, गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी देते हुए लड़की को जबरन अभिरक्षा से छुड़ा लिया। हालांकि बाद में टीम ने लड़की को सुरक्षित बचा लिया।इस मामले में पुलिस ने 19 नामजद आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। आरोपियों पर बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।इसके बाद आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर FIR रद्द करने की मांग की थी।मामले की सुनवाई जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की डिविजन बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि आरोपों की प्रकृति गंभीर है और इस स्तर पर FIR रद्द कर जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

पर्सनल लॉ के तर्क को हाईकोर्ट ने किया खारिज
याचिकाकर्ताओं की ओर से मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 और मेजॉरिटी एक्ट, 1875 का हवाला दिया गया था।दलील दी गई थी कि मुस्लिम कानून के अनुसार यौवन अवस्था प्राप्त करने के बाद लड़की विवाह के लिए सक्षम मानी जाती है और PCMA कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ को प्रभावित नहीं कर सकता।हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों को खत्म नहीं कर सकता।Allahabad High Court ने स्पष्ट किया कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु वही होगी, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में निर्धारित है।कोर्ट ने कहा कि विवाह संस्था में शारीरिक संबंध एक स्वाभाविक हिस्सा है। ऐसे में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के विवाह की अनुमति देना पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होगा।हाईकोर्ट ने कहा कि PCMA और POCSO जैसे कानून सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति से जुड़े हैं। इन कानूनों के पीछे वैज्ञानिक सोच और बच्चों के संरक्षण का उद्देश्य है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन कानूनों से बचने के लिए किसी भी व्यक्तिगत कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता।
पुलिस कार्रवाई में हस्तक्षेप से कोर्ट ने किया इनकार
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभा रही थी।कोर्ट ने माना कि टीम के काम में बाधा डालना और नाबालिग लड़की को जबरन छुड़ाना प्रथम दृष्टया गंभीर अपराध है, जिसकी जांच जरूरी है।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी और जांच प्रक्रिया जारी रखने का आदेश दिया।कोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को दिए गए अंतरिम रोक के आदेश को भी समाप्त कर दिया। साथ ही आदेश की प्रति वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बुलंदशहर को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश दिया।
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